क्या आप जानते हैं ? लोहडी पंजाब का प्रमुख त्योहार है ?
लोहड़ी का पर्व एक राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी कि याद में पुरे पंजाब और हिमाचल , हरियाणा सहित उत्तर भारत में मनाया जाता है ,
लोहड़ी की शुरुआत के बारे में मान्यता है कि यह राजपूत शासक दुल्ला भट्टी द्वारा गरीब कन्याओं सुन्दरी और मुंदरी की शादी करवाने के कारण शुरू हुआ है. दरअसल दुल्ला भट्टी पंजाबी आन का प्रतीक है. पंजाब, राजस्थान गुजरात की तरह विदेशी आक्रमणों का सामना करने वाला प्रान्त था । ऐसे में विदेशी आक्रमणकारियों से यहाँ के लोगों का टकराव चलता था .
दुल्ला भट्टी का परिवार विदेशी आक्रांताओं का विरोधी था.वे आक्रांताओं को लगान नहीं देते थे. इन आक्रांताओं ने दुल्ला के दादा सांदल भट्टी और पिता का वध करवा दिया..
दुल्ला भट्टी इसका बदला लेने के लिए इन से संघर्ष करता रहा. विदेशी आक्रांताओं की नजर में वह डाकू था लेकिन वह गरीबों का हितेषी था. आक्रांता आम जनता पर अत्याचार करते थे और दुल्ला आम जनता को अत्याचार से बचाता था.
दुल्ला भट्टी पंजाब में रहता था। उस समय पंजाब में स्थान स्थान पर स्थानीय लड़कियों को यौन गुलामी के लिए बल पूर्वक अरब देशों के अमीर लोगों को बेचा जाता था।
दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न सिर्फ मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी भी उनके समाज के लडको से करवाई और उनकी शादी कि सभी व्यवस्था भी करवाई।
सुंदर दास नामक गरीब किसान भी आक्रांताओं के अत्याचार से त्रस्त था. उसकी दो पुत्रियाँ थी सुन्दरी और मुंदरी. गाँव का नम्बरदार इन लडकियों पर आँख रखे हुए था और सुंदर दास को मजबूर कर रहा था कि वह इनकी शादी उसके साथ कर दे.
सुंदर दास ने अपनी समस्या दुल्ला भट्टी को बताई. दुल्ला भट्टी ने इन लडकियों को अपनी पुत्री मानते हुए नम्बरदार को गाँव में जाकर ललकारा. उसके खेत जला दिए और लडकियों की शादी वहीं कर दी।जहाँ सुंदर दास चाहता था. इसी के प्रतीक रुप में रात को आग जलाकर लोहड़ी मनाई जाती है.!!
दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी। वैसे तो हिन्दु धर्म में शादी मे 7 फेरे होते है पर उस वख्त जब सुन्दर मुन्दरी की चौथा फेरा हो रहा था तो इन आक्रांताओं ने दूल्ले को गोली मरवा दी थी और लोगो ने इसी 4 फेरे वाली शादी को ही सम्पूर्ण मान लिया था, तभी से राजस्थान गुजरात की तरह पँजाबी हिन्दु भी शादी मे 4 फेरे लेते है और बाकी भारत मे 7 फेरे ली जाती है । राजस्थान में लोक देवता पाबूजी राठौड़ व गुजरात में लोकदेवता वच्छराज सोलंकी ( वाछरा दादा) की कथा भी इसी तरह की है आज भी इनके वंशज भी शादी के समय चार ही फेरे लेते हैं दुल्ला भट्टी की इस कथा की हमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है :
सुंदर मुंदरिए - हो तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया - हो!
दुल्ला भट्टी विदेशी आक्रांताओं कि धार्मिक नीतियों का घोर विरोधी था। वह सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष था.उसके पूर्वज संदल बार रावलपिंडी के शासक थे जो अब पकिस्तान में स्थित हैं। यह वही शहर है जिसको बप्पा रावल ने बसाया था इस शहर पर अनेक राजवंशों का शासन रहा, जिसमें गुहिल, भाटी, सोलंकी, सोढा प्रमुख है, दुल्ला भट्टी सभी पंजाबियों का नायक था। आज भी पंजाब(पाकिस्तान) सिंध, राजस्थान गुजरात सहित पाकिस्तान से लगते हुए बॉर्डर इलाक़े में दुल्ला भट्टी को नायक मानने वाली बड़ी आबादी वहां अभी भी निवास करती हैं ये पर्व भारत ही नहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी मनाया जाता हैं ।
लोहडी : पंजाब का प्रमुख त्योहार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें